जम्मू-कश्मीजब जम्मू कश्मीर में20 साल की आयु में जय सिंह को जम्मु रज्य का मुख्य सेनापति…

जम्मू-कश्मीजब जम्मू कश्मीर में20 साल की आयु में जय सिंह को जम्मु रज्य का मुख्य सेनापति…

जम्मू-कश्मीर के 20 साल की आयु में उन्हे जम्मु रज्य का मुख्य सेनापति नियुक्त किया गया।
उन्होने अपने राज्य में प्रराम्भिक शिक्षा अनिवार्य कर दी थी एवं बाल विवाह के निषेध का कानून शुरु किया। उन्होंने निम्न्वर्गिय लोगों के लिये मंदिर में प्रवेश के प्रतिबंध को हटवाया। वे मुस्लिम लीग तथा उनके सदस्यों के साम्प्रदयिक सोच के विरुद्ध थे। द्वितीय विश्वयुद्ध के समय वे शाही युद्ध मंत्रिमंडल के सदस्य थे।

महाराजा हरि सिंह एक साथ तीन तीन मोर्चों पर अकेले लड रहे थे। पहला मोर्चा भारत के गवर्नर जनरल और ब्रिटिश सरकार का था जो उन पर हर तरह से दबाव ही नहीं बल्कि धमका भी रहा था कि रियासत को पाकिस्तान में शामिल करो। दूसरा मोर्चा मुस्लिम कान्फ्रेस और पाकिस्तान सरकार का था जो रियासत को पाकिस्तान में शामिल करवाने के लिये महाराजा को बराबर धमका रही थी।

जिन्ना २६ अक्तूबर १९४७ को ईद श्रीनगर में मनाने की तैयारियों में जुटे हुये थे। तीसरा मोर्चा जवाहर लाल नेहरु और उनके साथियों का था जो रियासत के भारत में विलय को तब तक रोके हुये थे, जब तक महाराजा शेख के पक्ष में गद्दी छोड़ नहीं देते। नेहरु ने तो यहाँ तक कहा कि यदि पाकिस्तान श्रीनगर पर भी कब्जा कर लेता है तो भी बाद में हम उसको छुड़ा लेंगे, लेकिन जब तक महाराजा शेख की ताजपोशी नहीं कर देते तब तक रियासत का भारत में विलय नहीं हो सकता।

पुरा मामला शुरू होता है गोल मेज से 

कुछ महीने पहले ही कश्मीर की सीमा पर खडे होकर नेहरु ने कश्मीर के राज्यपाल को कहा था, ‘तुम्हारा राजा कुछ दिन बाद मेरे पैरों पड़कर गिडगिडायेगा।’ शायद महाराजा का कसूर केवल इतना था कि १९३१ में ही उन्होंने लंदन में हुई गोल मेज कान्फ्रेंस में ब्रिटेन की सरकार को कह दिया था कि ‘हम भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष में एक साथ हैं।’ उस वक्त वे किसी रियासत के राजा होने के साथ साथ एक आम गौरवशाली हिन्दुस्तानी के दिल की आवाज की अभिव्यक्ति कर रहे थे।

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हरि सिंह ने तो उसी वक्त अप्रत्यक्ष रुप से बता दिया था कि भारत की सीमाएं जम्मू कश्मीर तक फैली हुई हैं। लेकिन पंडित नेहरु १९४७ में भी इसे स्वीकार करने को तैयार नहीं थे। वे अडे हुए थे कि जम्मू कश्मीर को भारत का हिस्सा तभी माना जायेगा जब महाराजा हरिसिंह सत्ता शेख अब्दुला को सौंप देंगे। ऐसा और किसी भी रियासत में नहीं हुआ था। शेख इतनी बडी रियासत में केवल कश्मीर घाटी में भी कश्मीरी भाषा बोलने वाले केवल सुन्नी मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करते थे।

बिना किसी चुनाव या लोकतांत्रिक पद्धति से शेख को सत्ता सौंप देने का अर्थ लोगों की इच्छा के विपरीत एक नई तानाशाही स्थापित करना ही था। नेहरु तो विलय की बात हरि सिंह की सरकार से करने के लिये भी तैयार नहीं थे। विलय पर निर्णय लेने के लिये वे केवल शेख को सक्षम मानते थे, जबकि वैधानिक व लोकतांत्रिक दोनों दृष्टियों से यह गलत था। महाराजा इस शर्त को मानने के लिये किसी भी तरह तैयार नहीं थे