रावण, भगवान शिव को लंका ले जाने में क्यों विफल हुए

रावण, भगवान शिव को लंका ले जाने में क्यों विफल हुए

रावण, भगवान शिव को लंका ले जाने में क्यों विफल हुए

12 ज्योतिर्लिंगों में से एक पवित्र वेदनाथ शिवलिंग झारखंड के देवधर में स्थित है इस जगह को लोग बाबा धाम के नाम से भी जानते हैं। कहते हैं कि भोलेनाथ यहां आने वाले सभी व्यक्तियों की मनोकामना को पूरी करते हैं। इसीलिए इस शिवलिंग को कामना लिंग भी कहा जाता है। 12 ज्योतिर्लिंगों के बारे में बताया जाता है कि जहां जहां महादेव साक्षात प्रकट हुए वहां यह स्थापित की गई इसी तरह पुराणों में वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग की भी एक कथा है जो लंकापति रावण से जुड़ी हुई है तो चलिए जानते हैं

बाबा बैद्यनाथ धाम की कथा के बारे में।
भगवान शिव के भक्त रामा और बाबा बैद्यनाथ की कहानी बड़ी निराली है पुराणी कथा के अनुसार दशानन रावण भगवान शंकर को पसंद करने के लिए हिमालय पर तब कर रहा था वह एक-एक करके अपने सर को धड़ से अलग कर शिवलिंग पर चढ़ा रहा था। अपने 9 सिर चढ़ाने के बाद जब रावण अपना 10वां सिर काटने वाला था तो भोलेनाथ ने प्रसन्न होकर उसे दर्शन दिए और उससे वर मांगने के लिए कहा। तब रावण ने कामना लिंग को भी लंका ले जाने का वरदान मांग लिया।

रावण के पास सोने की लंका के अलावा तीनों लोको में शासन करने की शक्ति तो थी ही ,साथ ही उसने कई देवता, यक्ष और कन्धर्वो को कैद कर लंका में रखा हुआ था। इस वजह से रावण ने यह इच्छा जताई कि भगवान शिव कैलाश को छोड़कर लंका में रहे। महादेव ने उसकी इस मनोकामना को पूर्ण तो किया पर साथी एक शर्त भी रख दी उन्होंने कहा अगर तुमने शिवलिंग की रास्ते में कहीं भी रखा तो मैं फिर वही रह जाऊंगा। और नहीं उठूंगा, रावण ने यह शर्त मान ली। इधर भगवान शिव की कैलाश छोड़ने की जानकारी सुनते ही सभी देवता चिंता में पड़ गए। इस समस्या के समाधान के लिए सभी भगवान विष्णु के पास गए।

तब श्री हरि ने लीला रची भगवान विष्णु ने वरुण देव को आचमन के जरिए रावण के पेट में घुसने के लिए कहा इसलिए जब रावण आचमन करके शिवलिंग को लेकर श्रीलंका की ओर जा रहा था, तो देवघर के पास उसे लघुशंका लगी। ऐसे में रावण एक ग्वाले को शिवलिंग देकर लघुशंका करने चला गया कहते हैं उस बैजू नाम के ग्वाले के रूप में भगवान विष्णु थे । इस वजह से भी यह तीर्थ स्थान वैजनाथ धाम और रामणेशवर धाम दोनों नामों से जाना जाता है। इधर बैजू ने शिवलिंग धरती पर रख दिया तथा रावण के आने पर बहाना बनाया शिवलिंग काफी भारी था। रावण की लाख कोशिशों के बाद भी शिवलिंग उठा नहीं।

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तब उसे भी भगवान की यह लीला समझ में आ गई और वह क्रोधित शिवलिंग पर अपना अंगूठा गाढ़ कर चला गया। उसके बाद ब्रह्मा विष्णु आदि देवताओं ने आकर उस शिवलिंग की पूजा की। शिव जी के दर्शन होते ही सभी देवी देवताओं ने शिवलिंग की उसी स्थान पर स्थापना कर दी और शिव स्तुति करके वापस स्वर्ग को चले गए तभी से महादेव कामना लिंग के रूप में देवघर में विराज थे। पुराणों के अनुसार भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र के तिलहर से मदा शक्ति के हृदय का भाग यहीं पर कट कर गिरा था वेदना दरबार मदा शक्ति के 51 शक्तिपीठों में से एक है ।

कहते है शिव को शक्ति के मिलन स्थल पर ज्योतिर्लिंग की स्थापना स्वयं देवताओं ने की थी वैद्यनाथ धाम के बारे में कहा जाता है कि यहां मांगी गई मनोकामना देर से ही सही लेकिन पूरी जरूर होती है भगवान श्री राम और महाबली हनुमान जी ने श्रावण मास में यहां कावड़ यात्रा भी की थी। वेदनाथ धाम में स्थित भगवान भोले शंकर का ज्योतिर्लिंग यानी शिवलिंग नीचे की तरफ से दबा हुआ है शिव पुराण और पदम पुराण के पाताल खंड में ज्योतिर्लिंग की महिमा गाई गई है.

मंदिर के निकट एक तालाब स्थित है बाबा बैद्यनाथ का मुख्य मंदिर सबसे पुराना है जिससे आसपास और भी अनेकों मंदिर बने हुए हैं भोलेनाथ का मंदिर माता पार्वती जी के मंदिर के साथ जुड़ा हुआ है यहां प्रतिवर्ष महाशिवरात्रि के 2 दिन पूर्व बाबा मंदिर और मां पार्वती तथा लक्ष्मी नारायण के मंदिर से पंचसोल उतारे जाते हैं। इस दौरान पंचशोल को स्पष्ट करने के लिए भक्तों की भीड़ उमर जाती है।

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